Skip to content

सफ़र की शुरुआत (Beginning of the Voyage)

May 28, 2010

अतीत में झाँक कर देखता हूँ, और सोचता हूँ  – क्या था, क्या हूँ ञौर कभी-कभी ये भी सोच लेता हूँ कि क्या हूँगा ।

कितना ही साधारण सा था वो ञसाधारण मेरा ञतीत । ना ही कोइ हिरोइक्स, ना ही कुछ असधारण, ना ही कुछ विस्मयकारी, ना ही कुछ अदभूत !!! मै तो ये भी सोचता हूँ कि इस ब्लाग की दुनिया में, जहाँ हर किसी के पास अदभूत, असाधारण, विस्मयकारी, अविस्मरणीय, अनोखा कहने को है, मैं कर क्या रहा हूँ ?  मेरे पास तो ऎस अनोखा कुछ भी नहीं है, लेकिन तभी मुझे कुछ याद आया जहाँ सबकुछ असाधारण हो वहाँ साधारण एवं सामान्य होना भी कितनी असाधारण एवं असामान्य बात है! 

 दो-चार शब्द एवं वाक्य लिखना शुरू किया तो एक अच्छी अनुभूति सी हो रही है । कोई चीज अगर आपके दिल के बहुत करीब हो और आप उस काम को करने की इच्छा रखते है किंतु साथ ही साथ आपको अपनी सीमाओं का भी एह्सास हो तो शायद आपलोगो को इस बात का ज्ञान होगा कि मन में कैसी व्याकुलता होती है । कुछ ऎसा ही मुझमें और मेरी लेखनी के प्रयास में भी है । मालुम नहीं कब से धीरे-धीरे पढना और थोडा-बहुत लिखना हृदय के इतना पास हो गया, और धीरे-धीरे ये लिखने की इच्छा तीव्र होती ही रही, और जब ब्लाग कि दुनिया से परिचय हुआ तो मैं इस माध्यम का मुरीद हुए बिना न रह सका । प्रौद्योगिकी ने सच मे ही वो कई चीजें संभव कर दिखाई जो कुछ वर्षों पहले कल्पना से भी परे थी । सच ही है न, अन्यथा मुझ जैसा अनजान राहगीर तो ऎसा कुछ सोच भी नही सकता था, वो कहते है ना कि “technology is a great leveler” वही बात है ।

मै यहाँ पर an Indian home maker के blogadda के साथ के साक्षात्कार से एक वाक्य उद्धृत करना चाहुँगा:- For anybody who likes to write, having a place of your own, to write and to find someone actually reading it is like a dream.

मेरी भावनाओं को बखूबी ये वाक्य प्रतिबिंबित करता है ।

 सच कहा जाए तो मेरे लिए यह एक catharsis की तरह है । क्या होता है कि आजकल दुनिया तकनीक एवं प्रोद्योगिकी के माध्यम से काफी छोटी हो गयी है, किंतु मैनें ये महसूस किया है कि लोग एक-दूसरे से दूर होते जा रहे है । इन्सान खुद मे ही कहीं सिमट सा गया है, एक अदृष्य सी, न दिखाई देने वाली, चारदीवारी में खुद को कैद किए बैठा है वो । ऎसा ही कुछ मैने अपने साथ भी महसूस किया । अपनी सोच, अपनी भावनाओं को व्यक्त करने से भय सा महसूस होता था । मै दूर-दूर तक ले जाता अपने विचारों को कल्पनाओं को, ढूँढता-तालाशता किसी को पर किसी को न पाकर वापस लॉट आता । मेरे मोबाईल में 300 संपर्क है, पर अक्सर ऎसा भी हुआ है कि मैने काफी प्रयास के बावजूद भी थक कर अपने आप को फिर खुद मे ही समेट लिया है । और इसका कारण ? भय ! तिरस्कार क भय । Fear of repudiation. सबसे बड़ा भय है ये । और इस भय का ही परिणाम है ये ब्लाग । यहाँ ये भय मुझको न सताता है कि कौन मुझे स्वीकारेगा और कौन मुझे कर देगा तिरस्कृत । और इसलिए मैं ये कहता हूँ कि मै ये ब्लाग खुद के लिए लिख रहा हूँ और न कि दुनिया के लिया, ये मेरे लिए catharsis है । किंतु, यदि कुछ वर्षों के उपरांत मै ये कह पाया कि “मै तो अकेला ही चला था लोग मिलते गये और कारवाँ बनता गया”, तो शायद एक सुखद सी अनुभूति होगी और यदि ऎसा न भी हो पाया और इसका कोई मलाल न हो तो ये भी तो मेरी जीत ही होगी।

 कई बार कुछ लिखने, कुछ कहने की इच्छा जागी। (कैसे ? मालुम नहीं और शायद मालुम भी हो !!) । लेकिन सोंच को, कल्पनाओं को, विचारों को, मन के उड़ानो को शब्दों, वाक्यों, अनुच्छेदों, कविताओं, लेखों, कहानियों, उपन्यासों मे कैद ही न कर पाता, न ही उन्हें मूर्त आकार दे पाता । कोशिश ही न कर पाता, शायद कोशिश करने की कोशिश ही न की ।

कई बार दुनिया मे घटती घटनाओं, जो मन को विचलित करती थी, उनपर अपने विचार व्यक्त करना चाहा, पर माध्यम न था । अब सोचता हूँ कि शायद कुछ कह पाउँगा । कोशिश तो कर ही सकता हूँ ।

अच्छा तो मै किन विषयों पर बात करना चाहुँगा – कुछ अपनी बातें । कुछ औरों की बातें । साहित्य की बातें । समाज की बातें । थोडी राजनिती की । थोड़ी अर्थजगत की । थोड़ी बापू की । थोड़ी चाचा की । थोड़ी पुस्तकों की । थोड़ी सिनेमा की । थोड़ी काम की । और थोड़ी बेकाम की । थोड़ी जान-पहचान की । थोड़ी अनजान की । थोड़ी विचार की । थोड़ी शून्य की । और थोडी विचारशून्यता की । थोड़ी दोस्ती की । थोड़ी दुश्मनी की भी । थोड़ी देश की । थोड़ी विश्व की । थोड़ी प्यार की । थोड़ी पीड़ा की । थोड़ी गीत की । थोड़ी ग़ज़ल की । थोड़ी …… थोड़ी……..

और आखिर में गुलज़ार साहब की एक रचना –

आओ फिर नज़्म कहें

फिर किसी दर्द को सहलाके सुजा ले आँखे

फिर किसी दुखती हुई रग से छुआ दे नश्तर

या किसी भूली हुई राह पे मुड़कर इक बार

नाम लेकर किसी हमनाम को आवाज ही दे लें

फिर कोई नज़्म कहें …..

मेरी पहली पोस्ट है शायद कुछ दिनो के बाद में जब इसे देखुँगा तो खुद पे हँसू ।  पर जीवन मे ऎसा तो अक्सर ही होता है, जब हम पुरानी बातें याद कर के खुद पे हँसा करते हैं ।

Advertisements
6 Comments leave one →
  1. June 2, 2010 4:05 PM

    I thought its too long without any comments, so let me comment myself. Dont loose heart man…..

  2. June 5, 2010 11:06 PM

    First of all, आगाज़ को सलाम !

    Don’t loose heart man, funtoosh people are there to encourage good words spoken with honesty. फिर कोई नज़्म कहें ….. what a line to end your first post. All of us write as they say in a poem : मैं भी मुँह मे ज़बान रखता हूँ काश पूछो कि मुद्दा क्या है।

  3. June 5, 2010 11:14 PM

    “For anybody who likes to write, having a place of your own, to write and to find someone actually reading it is like a dream.”

    I am also impressed with these lines. I will wait each of your writings in the future. Blogging is not something that you do only as a reaction to what other people write! It is about being proactive than reactive. Words translate feeling of inwards journey to a form of expression. And you had been successfully victorious over your fears of repudiation. Read Post by Steve Yegge ( http://sites.google.com/site/steveyegge2/you-should-write-blogs ) and Post by Rashmi Bansal ( http://youthcurry.blogspot.com/2006/03/blog-everywhere.html) for good blogging.
    Best of luck for the future.. कुछ तुम कहो, कुछ हम सुने !

  4. June 5, 2010 11:20 PM

    And never be creative for the sake of being creative and popularity. It takes extra time and attempt to come up with something creative and more sincere effort to become original. Originality isn’t everything. In the world of art and design, originality is highly prized, but sometimes the emphasis is a bit too strong. The point of design isn’t to be original, but to speak a message effectively. Harvey Keitel puts the soul of creative writing in the movie The Shadow Dancer — Get rid of that computer. Writing is not supposed to be easy, supposed to be hard. Typewriters make you think about the words you choose more carefully because you can’t erase them with the push of a button.

    • June 9, 2010 9:44 PM

      Yayaver SORRY and THANKS…..!!
      Sorry because of delayed reply. Thanks for the wonderful comments and invaluable suggestions. You can, I know, feel the feeling of getting first comment on ur blog. That is what. But one thing that I missed was – mentioning about you in my first post. But let me put on record that you are my first inspiration, its you because of whom I thought of blogging. Man, I love your blog.
      I could have a cursory glance of Steve Yegg’s and Rashmi Bansal’s post on blogging, they are really quite informative, useful noteworthy for any starter in the world of blogging.
      I want to write. Write like mad. But also I want to write a bit decently and I know that “writing is not easy”, more so if you are not spontaneous. And these days I am not getting time, I know lack of time can never be an excuse for anything because all the persons in world are busy yet find enough time to do what they love to do. But more than time its about mental peace and that is what lacking these, hopefully soon I will regain that also. I need to read a few of your posts for that for sure.
      I would love to write as frequently as possible, hope things turn for better.
      Thanks again.

  5. June 18, 2010 3:27 AM

    Oh man. Thanks for such respectable mention. Feeling glad. Waiting for the next post 🙂

    Only you can learn from others, nobody can teach you.this writing is like born instinct. a lot Writing without reading about any subjects produces crap. I read as it charts for me the changes that have happened, that will happen and that are happening today. It helps in the checking the obvious problems in mine writing by reminding me of my own mediocrity. And Write like mad, don’t care for size and flow. Its not rhytm or comedy people are looking in the blog. They want your truthful words…

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s

%d bloggers like this: