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निसार मैं तेरी गलियों पे…

August 27, 2010

ज़ैसा कि मैने अपने पिछले पोस्ट में लिखा था, फ़ैज़ साहब अपने जेल निवास के दौरान काफी बेहतरीन रचनाएँ लिखी है. उनमें से ही एक जो मुझे बहुत पसंद है “निसार मैं तेरी गलियों पे…”

निसार मैं तेरी गलियों पे…

निसार मैं तेरी गलियों पे ऎ वतन, कि जहां

चली है रस्म कि कोई न सर उठा के चले

जो कोई चाहने वाला तवाफ़ को निकले

नज़र चुरा के चले, जिस्मो-जां बचा के चले

                है अहले-दिल के लिए अब ये नज़्मे-बस्तो-कुशाद

                कि संगो-ख़िश्त मुक़्य्यद हैं और सग आज़ाद

बहुत हैं जुल्म के दस्ते-बहाना-जू के लिए

जो चन्द अहले-जुनूं तेरे नाम-लेवा हैं

बने हैं अहले-हवस मुद्दई भी, मुंसिफ़ भी

किसे वकील करें, किससे मुंसिफ़ी चाहें

               मगर गुज़ारने वालों के दिन गुज़रते हैं

               तेरे फ़िराक़ में यूं सुबहो-शाम करते हैं

बुझा जो रौज़ने-ज़िंदा तो दिल ये समझा है

कि तेरी मांग सितारों से भर गई होगी

चमक उठे हैं सलासिल तो हमने जाना है

कि अब सहर तेरे रुख़ पर बिखर गई होगी

              ग़रज़ तसव्वुरे-शामो-सहर में जीते हैं

              गिरफ्ते-साया-ए-दीवारो-दर में जीते हैं

युंही हमेशा उलझती रही है जुल्म से ख़ल्क

न उनकी रस्म नई है, न अपनी रीत नई

युंही हमेशा खिलाए हैं हमने आग में फूल

न उनकी हार नई है न अपनी जीत नई

             इसी सबब से फ़लक का गिला नहीं करते

             तेरे फ़िराक में हम दिल बुरा नहीं करते

गर आज तुझसे जुदा हैं तो कल बहम होंगे

ये रात भर की जुदाई तो कोई बात नहीं

गर आज औज पे है तालए-रक़ीब तो क्या

ये चार दिन की ख़ुदाई तो कोई बात नहीं

               जो तुझसे अहदो-वफ़ा उस्तुवार रखते हैं

               इलाजे-गर्दिशे लैलो-निहार रखते हैं

-फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

तवाफ़ को – परिक्रमा/घूमने के लिए;  नज़्मे-बस्तो-कुशाद – बंधन और मुक्ति की व्यवस्था; संगो-ख़िश्त – ईंट-पत्थर; मुक़्य्यद – क़ैद; सग – कुत्ते; दस्ते-बहाना-जू – बहाना बनाने वाले के हाथ; अहले-हवस – लोलुप; रौज़ने-ज़िंदा – कारागार का झरोखा; सलासिल – बेड़ियाँ; सहर – सुबह; रुख़ – मुखड़ा; तसव्वुरे-शामो-सहर – सुबह और शाम की कल्पना में; गिरफ्ते-साया-ए-दीवारो-दर – दीवारों और दरवाजों के सायों की पकड़ में; ख़ल्क – जनता; बहम – एकट्ठे; औज पे – आकाश पर; तालए-रक़ीब – प्रतिद्वन्दी का भाग्य; उस्तुवार – प्रेम निभाने की प्रतिज्ञा को सुदृढ़; इलाजे-गर्दिशे लैलो-निहार – रात-दिन के क्रम क इलाज

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