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December 7, 2010
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वह जो शायर था,

बहकी-बहकी-सी बातें करता था

आँखें कानों पे रख के सुनता था

गूँगी ख़ामोशियों की आवाज़ें

जमा करता था चाँद के साये

गीली-गीली-सी नूर की बूँदे

ओक में भर के खड़खड़ाता था

रूखे-रूखे-से रात के पत्ते

वक़्त के इस घनेरे जंगल में

कच्चे-पक्के-से लम्हे चुनता था

 

हाँ, वही, वह अजीब-सा-शायर

रात को उठके कोहनियों के बल

चाँद की ठोड़ी चूमा करता था

 

चाँद से गिर के मर गया है वह

लोग कहते हैं ख़ुदकशी की है

गुलज़ार

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