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October 5, 2014

“Kya Dilli Kya Lahore” begins with this beautiful rendition by Gulzaar Saab…

लकीरें हैं ..तो रहने दो,
किसी ने रूठ कर ,
गुस्से में शायद खींच दी थी
इन्हीं को अब बनाओ पाला,
और आओ अब कबड्डी खेलते हैं
लकीरें हैं ..तो रहने दो ।

मेरे पाले में तुम आओ, मुझे ललकारो
मेरे हाथ पर तुम हाथ मारो, और भागो
तुम्हें पकडू लिपटू,
और तुम्हे वापस न जाने दूँ
लकीरें हैं.. तो रहने दो ।

तुम्हारे पाले में जब कोड़ी-कोड़ी करता जाऊं मैं
मुझे तुम भी पकड़ लेना
छूने नहीं देना
वो शरहद लकीरें!

किसी ने रूठ कर ,
गुस्से में शायद खींच दी थी

लकीरें हैं … तो रहने दो
लकीरें हैं तो रहने दो

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